पीड़ित बच्चे की पहचान का खुलासा केवल बोर्ड या समिति की अनुमति से संभव : मो॰ हसन जैदी

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प्रयागराज : कोरोनाकाल में अनाथ हुए बच्चों की निजता व सुरक्षा बेहद जरूरी है। ऐसे बच्चों की पहचान को सार्वजनिक करना उनके जीवन को संकट में डालने जैसा हो सकता है। इससे वह गलत हाथों में जा सकते हैं क्योंकि बाल श्रम, अवैध दत्तक ग्रहण, बाल तस्करी, भिक्षावृत्ति से जुड़े गिरोह ऐसे बच्चों की पहचान जानकार उन्हें लालच देकर या बहला-फुसलाकर नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह कहना है जिला प्रवेशन अधिकारी (डीपीओ)पंकज मिश्रा का।

जिला प्रवेशन अधिकारी ने बताया कि पीड़ित व विवादों में फंसे बच्चों को संभावित नुकसान व बदले की कार्रवाई से बचाने के लिए उनकी पहचान को गोपनीय रखा जाता है। सरकारी सेवा में कार्यरत अधिकारी, कर्मचारी एवं एनजीओ व राजनैतिक दल ऐसे बच्चे की पहचान को सार्वजनिक तौर पर उजागर नहीं कर सकते हैं।

मीडिया भी नहीं कर सकती जानकारी साझा

डिजिटल व प्रिंट मीडिया भी ऐसे बच्चे की फोटो, वीडियो, स्केच को किसी भी सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर साझा नहीं कर सकती। यहाँ तक कि मीडियाकर्मी ऐसे बच्चों का नाम-पता जानने के लिए उन्हें मजबूर भी नहीं कर सकते हैं। जुबेनाइल जस्टिस अधिनियम, 2015 (जेजे एक्ट) के तहत अनिवार्य प्रोटोकॉल का पालन करते हुए कोविड महामारी से प्रतिकूल रूप से प्रभावित बच्चों की देखभाल और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता है। पीड़ित बच्चे की पहचान व निजी जानकारी सोशल मीडिया पर साझा करने वालों पर पुलिस की साइबर टीम नजर रख रही है।

पहचान के खुलासे पर दो वर्ष की है कैद

बच्चों से जुड़े मुद्दे के कानूनी सलाहकार व बाल कल्याण समिति के पूर्व जुडीशियल मजिस्ट्रेट मो॰ हसन जैदी ने बताया कि पीड़ित बच्चे की पहचान का खुलासा केवल बोर्ड या समिति की अनुमति से संभव है। आईपीसी की धारा 228ए एवं जुवेनाइल जस्टिस (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 74 एवं प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड फ्रॉम सेक्सुअल एब्यूज (पोक्सो एक्ट) एक्ट 2012 की धारा 23 (2) के तहत किसी पीड़ित बच्चे की पहचान को प्रकट करने वाले तथ्य जैसे कि उसका नाम, पता, तस्वीर, पारिवारिक ब्यौरा, विद्यालय, आस-पड़ोस की जानकारी को प्रकाशित नहीं किया जा सकता और न ही उसे किसी सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर साझा किया जा सकता है। इसका उल्लंघन करने वालों को दो वर्ष की कैद या दो लाख रुपए तक जुर्माना या दोनों सजा से दंडित किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया था निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने निपुल सक्सेना बनाम भारत सरकार केस 2018 में स्पष्ट निर्देशित किया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 376ए, 376बी, 376सी, 376डी या 376ई के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट से संबंधित प्राथमिकी शिकायत (एफ़आईआर) को भी सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे पीड़ित से संबंधित सभी दस्तावेज सीलबंद कवर में रखेंगे, जिससे कभी पहचान उजागर न हो सके। अगर पीड़िता की मौत हो गई हो तब भी पीड़िता के नजदीकी रिश्तेदार के चाहने के बाद भी सक्षम प्राधिकारी, जो वर्तमान में सत्र न्यायाधीश हैं उसके अनुमति के बिना पीड़िता का नाम व उसकी पहचान को उजागर नहीं किया जा सकता है।

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