शिक्षा से ही संवरेगा दिव्यांग बच्चों का कल: नंद किशोर यागिक

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प्रयागराज : जनपद के दिव्यांग जन सशक्तिकरण विभाग कि ओर से संचालित ‘बचपन डे केयर सेन्टर्स’ दिव्यांग बच्चों की प्री प्राथमिक पाठशाला है। यह स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल के निकट स्थित है। विद्यालय में तीन से सात वर्ष के श्रवण बाधित, दृष्टि बाधित व मानसिक अक्षम प्रभावित कुल 60 बच्चे पढ़ते हैं। पेशे से बतौर शिक्षिका (एचआई) सविता जयसवाल (उम्र-38) बीते पंद्रह वर्ष से विद्यालय में कर्तव्य का निर्वहन कर रही हैं।

सविता ईमानदार व लगनशील अध्यापिका

जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी नंद किशोर यागिक ने बताया कि इस विशेष पाठशाला में शिक्षक बड़ी मेहनत और लगन से अध्यनरत दिव्यांग बच्चों को शिक्षण प्रशिक्षण देने का कार्य करते हैं। किसी बच्चे के भविष्य को संवारने के लिए शिक्षा सबसे जरूरी मार्ग है। विशेष शिक्षिका सविता जयसवाल बेहद ईमानदार व लगनशील अध्यापिका हैं। उनका इन बच्चों के साथ कार्य करने का लंबा व सफल अनुभव रहा है। दिव्यांग जन सशक्तिकरण विभाग में बचपन डे सेंटर के अतिरिक्त श्रवण दिव्यांग बच्चों के लिए संकेत विद्यालय, दृष्टि दिव्यांग बच्चों के लिए स्पर्श व बौद्धिक दिव्यांग बच्चों के लिये ममता विद्यालय संचालित हैं।

इन बच्चों को अगर भरपूर प्यार दिया जाए

दिव्यांग बच्चों के मानसिक व शैक्षिक विकास से संबन्धित पहलुओं पर सविता ने अपना अनुभव साझा किया। सविता ने बताया कि ‘जीवन में जब सब कुछ खत्म हो जाता है, तब हमारे पास खोने को कम और पाने के लिए बहुत कुछ होता है। इस बात को समझें तो केवल परिजन का एक फैसला व बच्चे का हौसला किसी भी दिव्यांग के जीवन को नई दिशा दे सकता है। इन बच्चों को अगर भरपूर प्यार दिया जाए व इनपर भरोसा किया जाए तो यह अपनी क्षमता से कई गुना अधिक परिश्रम करने से भी पीछे नहीं हटते हैं।‘

अभिभावकों की जागरूकता शिक्षक से अहम

उन्होने बताया कि अभिभावकों को जागरूक होना पड़ेगा उन्हें यह समझने कि आवश्यकता है कि उनके बच्चे में किस प्रकार की दिव्यांगता है। अगर वह शारीरिक रूप से दिव्यांग है तो उस बच्चे को सामान्य विद्यालय में भी पढ़ने के लिए भेजा जा सकता है। अति गंभीर बौद्धिक दिव्यांग व श्रवण दिव्यांग बच्चों को स्पेशल स्कूल भेजना चाहिए। कोई भी निजी या सरकारी विद्यालय किसी दिव्यांग बच्चे को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता है।  कई माता-पिता अपने दिव्यांग बच्चे की प्रतिभा को नजरंदाज कर उन्हें घर की चार दीवारी में रखना चाहते हैं। इससे इन बच्चों में नकारात्मक भाव पैदा होता है। मनोवैज्ञानिक तौर पर ऐसे बच्चों का मानसिक विकास रुक जाता है। वह हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। अभिभावक अपने बच्चों को समाज से जोड़ें व उनके शिक्षा, स्वास्थ एवं अधिकारों को लेकर जागरूक रहें। जीवन की चुनौतियों से हौसले के साथ उन्हें लड़ना सिखाएँ। परिजन का साथ ही दिव्यांग बच्चे के सपनों को से सकता है उड़ान।

दिव्यांग बच्चों को जोड़ें समावेशी शिक्षा से

सविता ने बताया कि ‘गाँव व शहर की मलिन बस्तियों में रहने वाले कुछ दिव्यांग बच्चे कभी विद्यालय नहीं पहुंच पाते। ऐसे बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा ही महत्वपूर्ण व आधुनिक आयाम है। ऐसे बच्चों का सरकारी विद्यालय में दाखिला कराएं।  क्योंकि समावेशी शिक्षा मात्र एक दृष्टिकोण नहीं है बल्कि एक सशक्त माध्यम है उन बच्चों के लिए जो तमाम बाधाओं के बावजूद सीखने व पढ़ने की चाहत रखते हैं। हमारा समाज दिव्यांग बच्चों के प्रति सिर्फ संवेदनाएं ना प्रकट करे। यह संवेदना बच्चे को बार-बार दिव्यांगता का एहसास कराती है। अगर हृदय में इन बच्चो के लिए जरा भी संवेदना हो तो ऐसे बच्चों को शिक्षा से जोड़ें व इन्हें अपने सपनों को पूरा करने का मौका दें।‘

स्वाभिमान के साथ जीना सिखा रहे

विद्यालय के समन्वयक चंद्रभान द्विवेदी ने बताया कि “इस विद्यालय में कुल छः शिक्षक एवं अन्य कर्मचारीगण नियुक्त हैं। जो विद्यालय के सभी दिव्यांग बच्चों को स्वाभिमान के साथ जीना सिखा रहे हैं। इस विद्यालय में सहायक अध्यापक के तौर पर संदीप शुक्ला, प्रीति सिंह (बौद्धिक अक्षम), महेश मिश्रा, सविता जायसवाल (एचआई), दिलीप पाण्डेय व संजू कुशवाहा (वी.आई.) अध्यापक के तौर पर सेवा दे रहे हैं। शिक्षकों का प्रयास यही रहता है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा दें व उनमें रोज़मर्रा के क्रिया कलापों की समझ विकसित कर प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें तैयार करें ताकि वह आत्मनिर्भर बनें व उन्हें किसी पर निर्भर होने की आवश्यकता न पड़े।

( प्रयागराज के लेखक एवं पत्रकार श्रवण शर्मा की रिपोर्ट)

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