नवीनतम शिक्षा नीति बाल श्रम रोकने में होगी कारगर : प्रेमा राय

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प्रयागराज : शिक्षा जीवन का आलोकिक और उसके उन्नयन का सर्वोत्तम साधन है। इसलिए शिक्षा की अनिवार्य आवश्यकता निर्विवाद है। जीवन में शिक्षा की महत्ता को समझते हुये ही 6-14 आयु वर्ग के समस्त बच्चों को नि:शुल्क प्रारंभिक शिक्षा सुलभ कराने का संकल्प संविधान में है। संविधान के निर्देशों के अनुपालन में प्रारंभिक शिक्षा के प्रचार प्रचार तथा सार्वजनीकरण के लिए व्यापक योजनाएं एवं नीतियां बनाई गयीं। विभिन्न कारणों से शिक्षा से विमुख होकर बाल श्रम की ओर भागते बच्चों की समस्या पर सम्पूर्ण-जगत का ध्यान आकर्षित करने के लिए हर साल ‘विश्व बाल श्रम निषेध दिवस’ मनाया जाता है।

संविधान में मूल अधिकारों के अनुच्छेसद 24 के अंतर्गत बाल श्रम प्रतिबंधित है। शिक्षा या अन्य कारणवश किसी भी अभाव में बाल-मजदूरी की ओर बढ़ते बच्चों को कैसे रोका जाए आज यह अत्यंत चिन्तनीय विषय बन गया है। शहरी क्षेत्रों में कोरोनाकाल में जहां ऑनलाइन माध्यम से बच्चे स्कूल से जुड़े रहे हैं। पर वहीं ग्रामीण अंचल में नेटवर्क नहीं होने से ऑनलाइन पढ़ाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है। इस वजह से ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे शिक्षा के अभाव में खेती-बाड़ी या अन्य माध्यम से धन अर्जन करने में लग गए। बीता समय तो नहीं लौटाया जा सकता पर नई शिक्षा नीति से इन्हें जोड़कर स्कूल जाने के लिए इनके परिवारों को प्रेरित करना बेहद जरूरी है।

दुनियाभर में बाल मजदूरी में बच्चों की संख्या बढ़कर 16 करोड़ हो गयी है। दो दशक में पहली बार यह इतनी रफ्तार से बढ़ी है। कोविड-19 की वजह से लाखों और बच्चे बाल मजदूरी के जोखिम में पहुँच चुके हैं। रिपोर्ट ‘चाइल्ड लेबर: ग्लोबल एस्टीमेट्स वर्ष 2020, ट्रेंड्स एंड रोड फॉरवर्ड’ विश्व बाल श्रम निषेध दिवस (12 जून) से दो दिन पहले जारी किया गया है। इसमें कहा गया है कि बाल मजदूरी को रोकने की दिशा में प्रगति 20 साल में पहली बार अवरुद्ध हुई है। जबकि 2000 से 2016 के बीच बाल श्रम में बच्चों की संख्या 9.4 करोड़ कम हुई थी। 2011 की जनगणना की बात करें तो भारत में 5 से 14 साल के 25.96 करोड़ बच्चों में से 1.01 करोड़ बाल श्रम कर रहे हैं। करीब 43 लाख से ज्यादा बच्चे बाल मजदूरी करते पाए गए। दुनिया के कुल बाल मजदूरों में 12 फीसदी की हिस्सेदारी अकेले भारत की है। यह बेहद चिंतनीय विषय है।

देश में बच्चों के लिए अनेक राष्ट्रीय शिक्षा नीतियाँ बनी। नवीनतम शिक्षा नीति 2021 अब तैयार की जा चुकी है। इसमें शिक्षा का सार्वजनीकरण, अपने शिक्षार्थियों को ग्लोबल सिटीजन बनाना तथा उन्हें अपनी जड़ों से जोड़े रखना इसका मुख्य उद्देश्य है। उनके स्थानीय भाषा में उन्हें शिक्षा प्रदान करना आदि जो कि वस्तुतः एक बहुत उपयोगी और सकारात्मक पहल है। परन्तु सरल नहीं क्योंकि शिक्षा के सार्वजनीकरण की दिशा में हम भरपूर प्रयास करते रहे हैं। पर पूर्णतः सफल नहीं हुये हैं। पर इस नई शिक्षा नीति से देश को बहुत सी उम्मीदे हैं। जो बच्चों को बाल श्रम से बाहर निकालने में कारगर साबित हो सकती है। आज विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के दिन पुनः विचार करना होगा कि हमारे अथक प्रयास करने पर भी बच्चे विद्यालय क्यों नहीं पहुँच पा रहे हैं व बाल श्रम की ओ जाने को मजबूर हैं। इसके लिए सरकारी योजनाओं व प्रयासों के साथ-साथ समाज के लोगों को आगे आना होगा।

ग़रीब अभिभावकों को विद्यालय के माध्यम से बच्चों को दिये जाने वाले मुफ्त मध्यान्ह-भोजन, पुस्तकें, पोशाक तथा नि:शुल्क शिक्षा क्यों आकर्षक नहीं दिखती आखिर क्यों वह अपने घरेलू काम में बच्चों को लगाते हैं। क्या ऐसे अभिभावक की नजर में शिक्षा की उपयोगिता का कोई मतलब नहीं है। ऐसे परिवार में जागरूकता लाने की जरूरत है। गरीब माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा की ओर पूरा ध्यान देना चाहिए क्योंकि आज सरकार मुफ्त शिक्षा, खाना और कुछ स्कूलों में दवा जैसी चीजों की सुविधाएँ प्रदान कर रही है। शिक्षा के सार्वजनीकरण का लक्ष्य प्राप्त करने में केवल शिक्षा विभाग ही नहीं वरन् समाज के हर वर्ग की सहभागिता आवश्यक है।

ग़रीबी से निजात पाना सहज नहीं है। इसे कोई भी स्वेच्छा से नहीं पालता ,यह व्यक्ति की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। गरीब परिवार के लोग अपनी आजीविका चलाने में असमर्थ होते हैं, इसलिए वे अपने बच्चों को बाल मज़दूरी के लिए भेजते हैं। कई बार बच्चों की पारिवारिक मजबूरियां होती हैं। उनके परिवार में ऐसी दुर्घटनाएँ हो जाती हैं जिसके कारण उनके परिवार में कमाने वाला कोई नहीं रहता है। इसलिए उन्हें बचपन में ही होटलों, ढाबों, चाय की दुकान, कल कारखानों में मज़दूरी करने के लिए जाना पड़ता है। ऐसे बच्चों को लेकर उनके पुनर्वास शिक्षा व वित्तीय सहायता के लिए सरकार को जमीनी स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है। आज कोरोना के प्रहार ने वंचित बच्चों के परिजन के आगे आर्थिक समस्याओं पर भयंकर आघात करके उन्हें भुखमरी की ओर ढकेल दिया है। वैसे ही कभी बाढ़, बीमारी ,रीति रिवाज आदि जो शिक्षा ग्रहण करने में बाधक बनती हैं। ऐसे में आर्थिक समस्या के चलते बहुत से बच्चे बाल-श्रम की ओर बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे बच्चों को नियमित रूप से वित्तीय सहायता देने की योजना पर काम करना जरूरी है।

हमें किसी भी बाल श्रम का पता चले तो सबसे पहले हमें इसकी सूचना चाइल्ड लाइन 1098 पर फोन करके सूचित करना होगा। ऐसे बच्चे के परिवार वालों से बात करनी चाहिए। उनके हालातों को समझकर उनके बच्चे के भविष्य के बारे में उन्हें बताना चाहिए। बच्चों के परिवार वालों को बाल श्रम के नुकसान और कानूनी जुर्म के बारे में बताना चाहिए। जब किसी बच्चे को शोषित होते हुए देखें, तो उसकी व्यक्तिगत मदद करें। ऐसे बच्चों की सुरक्षा के लिए कार्यरत संगठनों के लिए स्वेच्छा से समय निकालें। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से कहें कि यदि वह बच्चों का शोषण बन्द नहीं करते हैं तो उनसे कुछ भी नहीं खरीदेंगे। बाल-श्रम से मुक्त हुए बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा के लिए कोष जमा करने में मदद करें। आपके किसी रिश्तेदारों या परिजनों के यहां बाल-श्रमिक हैं, तो आप सहजता पूर्वक चाय-पानी ग्रहण करने से मना करें और इसका सामाजिक बहिष्कार करें। अपने आस पास बस्तियों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करके बाल-श्रम की समस्या के बारे में सूचित करें और उन्हें प्रोत्साहित करें कि वह अपने बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजें। अपनी कम्पनी पर दबाव डालें कि बच्चों के स्थान पर वयस्कों की नियुक्ति करें।
प्रेमाराय
पूर्व सहायक. शिक्षा निदेशक प्रयागराज।

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