प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह को मिला डॉ राम कुमार वर्मा बाल नाटक सम्मान 2020

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लखनऊ: लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर डॉ रवीन्द्र प्रताप सिंह को हिंदी बाल नाटक विधा में सतत योगदान देने हेतु उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2020 का डॉ राम कुमार वर्मा बाल नाटक सम्मान प्रदान किया गया।

जलवायु परिवर्तन , पर्यावरण असंतुलन एवं इसके द्वारा मानव संसाधनों की क्षति , सांसारिक गतिविधियों में छिपे रहस्य और बाल मन के अनगिनत प्रश्नो की श्रृंखला , उनके उलझे मन के विकसित उपादानों हेतु शैक्षणिक एवं सृजनात्मक रंगों के सफल प्रयास रवीन्द्र प्रताप सिंह के नाटकों में परिलक्षित हैं।

‘एक था बच्चा चिड़िया का’, ‘खुशियां’ , ‘गर्मी से बेहाल’,‘छोटी चिड़िया’,‘जंगल में गीत’ ,‘नदी बह रही धीरे धीरे’ ‘नीला पानी’,‘पिराना गीत’,‘पॉलिथीन को न हरियाली को हाँ’,‘बच्चे लाएंगे बदलाव’,‘बदलाव राग’,‘हम मानेंगे बात ‘‘हवा हमारी नदी हमारी’,‘गायब होती छाया’, ‘जंगल सबका’ ,‘प्रकृति राग’,‘जंगल के कट रहे सहारे’,‘डाबे और सिन्ना’, ‘कितनी दुनिया कितने तारे’, ‘आओ करें नया सा कुछ’ ,‘मेरा सागर’ , ‘चलता रहे निरंतर’ , ‘पेंग ‘ ,’ पिंजरा’, ‘कवि के साथ’ उनके लोकप्रिय बाल एकांकी हैं। प्रोफेसर सिंह अंग्रेजी और हिंदी में समान रूप से लिखते हैं ।नाटक विधा में उन्हें पूर्व में मोहन राकेश सर्जना पुरस्कार एवं भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार प्राप्त हैं ।

मा डॉ रवीन्द्र प्रताप सिंह मानते हैं कि साहित्य सृजन की ऊर्जा बाल मन से ही परिलक्षित होती है। व्यक्तिगत , सामाजिक एवं मानसिक विकास की एक ऊर्जित प्रेरणा एवं शक्ति साहित्य में निहित है। उनका मानना है कि साहित्यिक संस्कृति न केवल स्वयं अपितु सामाजिक बंधनों की समझ को बलवती करती है ,यह एक माध्यम भी बनती है ,जिससे सदैव संस्कृति से जुड़े रहने का अवसर मिलता है। हिंदी और अंग्रेजी में समान रूप से ,निरंतर लेखन द्वारा काव्य , नाटक , निबंध , समीक्षा और साहित्य की अन्य विधाओं में उनका सृजन विभिन्न पारिवेशिक दबावों में भी उर्जित मन के संकल्पों का एक ऐसा इंद्रधनुष प्रस्तुत करता है जिसमे एक और तो पात्र के शैक्षणिक , सामाजिक आर्थिक ,मानसिक और व्यावहारिक गुणों की एक अनूठी श्रृंखला परिलक्षित होती है , तो वहीँ दूसरी ओर बिना किसी खांचे में बंधे एक यायावर मन को आकलित करने हेतु शोध के आयामों को देखने का अवसर प्रदान करती है।

उनकी अन्य रचनाओं में बाल साहित्य के दृष्टिकोण से चैन कहाँ अब नैन हमारे, (2017) ,वीरंगना झलकारी बाई ( 2018) काफी लोकप्रिय रही हैं। खेसरपिल्लू और उसके दोस्त (2019) नाटक और नाट्यात्मक कविताओं का संकलन हैं।एक साहित्यिक पत्रिका हेतु वे संस्कृति श्रृंखला,संस्कार पर्व श्रृंखला,देश प्रेम श्रंखला ,जल जीवन श्रंखला ,वायु जीवन श्रंखला,पशु पक्षी श्रंखला,कीट पतंग श्रंखला,बुन्नू और पशु पक्षी श्रृंखला ,पुष्प श्रृंखला ,मैना श्रृंखला के अंतर्गत कवितायेँ भी लिखते हैं। प्रोफेसर रवीन्द्र प्रताप सिंह का नाट्य विधा में प्रकशित साहित्य एवं हिंदी साहित्य में उनकी उनकी अन्य कृतियों में प्रमुख हैं – पाथेय (2013, संस्मरण एवं रेखाचित्र )अंतर्द्वंद (2016,नाटक) ,शेक्सपियर की सात रातें ( 2015, नाटक ) तीन पहर (2018, नाटक ) मोंताज (2018, काव्य ), पथिक और प्रवाह (2016 ,काव्य) , नीली आँखों वाली लड़की (2017 बाल साहित्य),विषाद (2018,नाटक ) एक अनंत फैला आकाश (2021 , काव्य )कोरोना और आम आदमी की कविता ,(2021 , काव्य ) ।

फ़्ली मार्केट एंड अदर प्लेज़ (२०१४ नाटक ), इकोलॉग(२०१४ नाटक ) , व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (२०१४नाटक ), बंजारन द म्यूज(२००८ काव्य ) , क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (२०१७ बाल साहित्य ), एडवेंचर्स ऑव फनी एंड बना (२०१८ बाल साहित्य ),द वर्ल्ड ऑव मावी(२०२० बाल साहित्य ), टू वायलेट फ्लावर्स(२०२० कविता ) प्रोजेक्ट पेनल्टीमेट (२०२१ काव्य ) उनके अंग्रेजी साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

उन्होंने उत्तर भारत के लोक नाट्यों एवं लोक साहित्य के विविध पाठों का स्वयं सर्वेक्षण एवं संकलन कर , प्रतिनिधि पाठों का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। लगभग एक दर्जन हिंदी संकलनों में भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित हुयी हैं। उनके लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट , शिक्षक श्री सम्मान ,मोहन राकेश सर्जना पुरस्कार , भारतेन्दु हरिश्चंद्र नामित पुरस्कार , एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे अट्ठारह पुरस्कार प्राप्त हैं ।

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