Holi में रंग खेलने का क्या है रहस्य

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होली का त्यौहार भारत ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है| होली पर रंग खेलने की परंपरा कैसे और कब शुरू हुई इस बारे में लोगों के अलग-अलग मत हैं| कुछ लोग इसे श्रीकृष्ण श्रीराधा रानी से जोड़ते हैं तो कुछ लोग इसे स्वास्थ्य से भी जोड़कर बताते हैं|

होली पर रंगों की परम्परा

पंडित रमेश गुरु बताते हैं कि होली पर रंगों की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा जी से जुड़ी हुई मानी जाती है वह बताते हैं कि प्रथम बार श्री कृष्ण और श्रीराधा रानी के मध्य रंग खेले जाने की बात सबसे ज्यादा प्रचलित है जो बाद मे रिवाज बन गई

स्वास्थ्य से है रंगों का नाता

जैसा कि हम जानते हैं कि भारत के अधिकतर त्यौहार मनुष्यों के लिए कुछ ना कुछ लाभ से जुड़े होते हैं कोई स्वास्थ्य प्रदान करता है तो कोई समृद्धि| इसी बात को आधार मानकर कुछ जानकारों का मानना है कि होलिका दहन से रंग खेलने के समय में हिंदी माह फाल्गुन का चैत्र में परिवर्तन होता है| अर्थात होलिका दहन फाल्गुन माह की पूर्णिमा को किया जाता है और रंग चैत्र माह की प्रथम तिथि अर्थात प्रतिपदा को खेला जाता है| तो हो सकता है हमारे पूर्वजों ने इस संक्रमण समय पर जीवाणु और बीमारी से बचाने के लिए यह परंपरा बनाई हो|

औषधीय पौधों और फूलों का रन बनाने में प्रयोग

जानकार कहते है कि हर्बल रंग आज भी लोगों की ज्यादा डिमांड पर रहते हैं| पौधों और फूलों की पंखुड़ियों से रंग बनाने की परंपरा कई इलाकों में आज भी देखने को मिलती है| तो ऐसे में संभव है कि हमारे जानकार बुजुर्ग इन औषधीय प्राकृतिक चीजों के माध्यम से ऐसे रंग और लेप तैयार करते हो जो त्वचा पर लगाने पर विषाणु और जीवाणुओं से मनुष्यों की रक्षा करते हो जिसने बाद में मॉर्डन रंगों का रूप ले लिया|

कब और किस तिथि को मनाई जाती Holi

हिंदी माह अर्थात Hindi calendar month जो चंद्रमा की गति पर आधारित होता है, के अनुसार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है| जो आमतौर पर इंग्लिश कैलेंडर जिसे हम सभी जानते हैं, के मार्च महीने में आता है|

होली क्यों और किस लिए मनाई जाती है

होली मनाने के पीछे होलिका और प्रहलाद की एक कहानी भी प्रचलित है जिसमें कहा जाता है कि प्रहलाद श्रीहरि विष्णु भगवान जी के भक्त थे जिनको हिरण्यकश्यप की बहन ने जिंदगी से दूर करने की कोशिश की थी परंतु वह खुद ही शिकार हो गई थी| क्योंकि उसका नाम होलिका था इसलिए उसी के उपलक्ष में होलिका दहन किया जाता है|

पहली बार कब मनाई गई थी होली

अगर सर्वप्रथम होली मनाने की बात करें तो यह उसी समय से मानी जाती है जब होलिका का दहन सर्वप्रथम हुआ था| वही श्री कृष्ण द्वारा श्रीराधा रानी जी को सर्वप्रथम रंग लगाए जाने के समय से भी रंगोत्सव का प्रारंभ माना जाता है|

मथुरा की Holi कैसी होती है

मथुरा वृंदावन भगवान श्री कृष्ण का जन्म स्थान है| जहां श्री बांके बिहारी जी का मुख्य मंदिर होने के अलावा बहुत सारे भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा जी के मंदिर हैं| मथुरा की होली अन्य सभी जगह से काफी अलग और उल्लास भरी होती है| यहां करीब 1 सप्ताह तक नंदगांव से लेकर, वृंदावन, बरसाना,गोवर्धन, गोकुल,श्रीकृष्ण जी के जन्म स्थान और प्रत्येक उस जगह होली का उल्लास भरा त्योहार मनाए जाता है, जहां इनके चरण पड़े या इनसे जुड़ी हुई कोई भी यादें हैं| यहां बलदेव में दाऊजी का होली समारोह देखते ही बनता है| यहां की लठमार होली जग प्रसिद्ध है| इसके अलावा लड्डुओं की होली, फूलों की होली, गीत गायन की होली, पूरे विश्व के भक्तों को मथुरा खींचकर ले आती है यहां की लोक भाषा में होली के गीत गाए जाते हैं| जिसमें श्री कृष्ण और श्रीराधा जी के प्रसंगों का वर्णन किया जाता है| बड़ा ही सुंदर और सुरमय नजारा होता है| इसीलिए कहा जाता है कि मथुरा की होली सभी जगह की होली से अलग है|

होली का प्राचीन नाम क्या है

होली का कोई निश्चित प्राचीन नाम नहीं है| कोई इसे होलाका कहता है| कोई होलिका कहता है| कोई फगुआ, धुलेंडी,फगवाह,रंग पूर्णिमा, कुमाऊं होली, गढ़वाली होली, फाल्गुन पूर्णिमा आदि अनेकों नाम है| अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से होली को पुकारा जाता है| महत्वपूर्ण यह है कि सभी जगह रंग जरूर खेले जाते हैं| भले ही रंगों को बनाने की प्रकृति भिन्न हो|

होली का अर्थ क्या है

होली एक English शब्द नहीं है| होली होलिका से निकला है|
क्योंकि होलिका दहन से ही यह त्योहार जुड़ा है इसलिए पुकारने मे यह होली कहलाता है| इस पर कई मत है| वहीं English का Holy word का हिन्दी मतलब पवित्र होता है|
बहुत से विद्वान होली शब्द का अर्थ पवित्रता बताते हैं| परंतु यहां गौर करने वाली बात यह है कि होली का प्रारंभ भारत से हुआ है| और भारत में उस समय English नहीं थी| ऐसे में यह उचित प्रतीत नहीं होता है| यह अलग बात है कि होली के त्यौहार पर कई पवित्र अनुष्ठान और कार्यक्रम किए जाते हैं| इसलिए होली का अर्थ होलिका से ज्यादा निकट समझ आता है| जिसे छोटे रूप में होली के नाम से प्रसिद्धि मिली|

होली पर निबंध कैसे लिखें

होली पर निबंध लिखने के कई तरीके हैं| एक अध्यापक के अनुसार अलग-अलग परीक्षाओं में अलग-अलग प्रकार से होली का निबंध लिखने को कहा जा सकता है| परंतु सामान्य रूप से निबंध में 4 विषय होना अनिवार्य समझा जा सकता है| पहला संदर्भ, दूसरा प्रस्तावना, तीसरा व्याख्या, और चौथा उपसंहार, संदर्भ में यह बताया जाता है कि जो निबंध आप लिखने जा रहे हैं उसकी जानकारी कहां कहां से प्राप्त हुई या आपने किन-किन पुस्तकों का अध्ययन किया और इस विषय की सामग्री प्राप्त की| दूसरा प्रस्तावना में यह बताया जाता है कि इस संबंध में आप क्या-क्या बताने जा रहे हैं| इसके बाद व्याख्या होती है इसमें पूरी जानकारी दी जाती है जैसे इस लेख को जो आप पढ़ रहे हैं यहां भी अलग-अलग हेडिंग के साथ जानकारी दी गई है| जानकारी कभी पूर्ण नहीं होती इसलिए जितना हो सके अलग-अलग विषयों से अलग-अलग पुस्तकों से जहां से भी हो सके प्राप्त करना चाहिए| इसके बाद उपसंहार मे संपूर्ण लेख का विवेचनात्मक सार, अर्थात आप इतने इसमें क्या सीखा, क्या देखा, क्या शिक्षा मिली, आदि-इत्यादि लिखने का प्रचलन है बहुत से लोग प्रस्तावना के बाद सारांश भी लिखते हैं जिसमें पूरे लेख का संक्षिप्त विवरण दिया जाता है परंतु इसके विषय में अधिक जानकारी संबंधित अध्यापक से लेना अत्यंत आवश्यक होता है क्योंकि अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रकार के निबंध लिखने की मांग हो सकती है|

डायलॉग ऑफ होली

होली में कई Dialogue आमतौर पर सुनने को मिलते हैं| जैसे ‘बुरा ना मानो होली है’ सबसे प्रसिद्ध Dialogue कहा जा सकता है| इसके अलावा ‘होली है’आपने लोगों को खूब कहते सुना होगा|’हैप्पी होली’बहुत ज्यादा बोला जाता है इसलिए होली के त्यौहार में जो आपके क्षेत्र में सबसे ज्यादा famous है वही डायलॉग है|

पुराने जमाने की और नए जमाने की होली में क्या diifrence है

पुराने जमाने की होली में लोग होली में बहुत ही बड़ा आयोजन किया करते थे| महीनों से इस दिन का इंतजार होता था| गाना बजाना, धूम धड़ाका, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सत्संग कार्यक्रम, ढोल नगाड़े, हर्षोल्लास, राधा कृष्ण का रूप बनाकर होली की लीलाएं जैसे अनेकों प्रकार के कार्यक्रम सामूहिक रूप से किए जाते थे| रंगो के रूप में शुद्ध नुकसान न करने वाले पदार्थों का प्रयोग किया जाता था| फूलों से रंग बनाए जाते थे| लोग गिले-शिकवे भूलकर होलिका दहन में अपनी आपसी रंजिश और बुराइयों को भी भस्म कर देते थे| पुराने जमाने की होली कई दिनों नहीं बल्कि महीनों तक चलती थी|
परंतु नए जमाने में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया है कि लोगों के पास समय की कमी हो गई है| अब लोग चाह कर भी बहुत दिनों तक होली नहीं खेल पाते हैं| दूसरा पहले जैसी प्रेम भावना अब नजर नहीं आती है| गांव हो या शहर एकता की भारी कमी नजर आती है| त्यौहार अपने परिवार और अपने परिचितों तक सिमट कर रह गया है| बहुत से लोग तो होली पर घर से निकलते ही नहीं है| रंगों की बात करें तो केमिकल से लेकर हर प्रकार के पदार्थों के रंग बन रहे हैं| जिससे त्वचा को नुकसान भी हो जाता है| आज की होली आपके सामने हैं| प्राचीन होली के बारे में अधिक जानने के लिए अपने आसपास के बड़े बुजुर्गों से बात करें तो वह आपको और भी कई मजेदार चौंकाने वाली बातें बताएंगे|

होली में लोग क्या क्या करते हैं

होली में लोग होलिका दहन पर पूजन अर्चन का कार्य संपन्न करते हैं| घरों में पकवान बनाए जाते हैं| अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग प्रकार के पकवान बनाने का रिवाज है| जिनमें सबसे ज्यादा प्रसिद्ध गुझिया है| लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं| पुराने गिले-शिकवे को भुलाने की कोशिश करते हैं| नए कपड़े पहने जाते हैं| जिनके पास अभाव हो वह अपने कपड़ों को साफ करके पहनते हैं| एक दूसरे को रंग गुलाल लगाते हैं| समूह बना के होली के गीत गाते हैं| ढोल नगाड़े बजाते हैं| कुल मिलाकर के कहा जाए तो तो हर वह कार्य करते हैं जिससे खुशी का संचार होता हो|

 

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